राजस्थान की राजधानी जयपुर की दक्षिण दिशा में 95 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती प्रसिद्ध बनास नदी के दक्षिण की ओर तथा जयपुर-कोटा राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे टोंक जिला मुख्यालय स्थित है।
टोंक जिले के मालपुरा, लावां, उनियारा व टोडारायसिंह आदि कई स्थान विशेष महत्त्व रखते हैं।
जिले का कोई क्रमबद्ध इतिहास नहीं है।
यत्र-तत्र बिखरे प्राचीन शिलालेख, ध्वसांवशेष, सिक्कों आदि से ही प्राचीन इतिहास के तथ्य उजागर होते है।
महाभारत काल में यह क्षेत्र संवादलक्ष था। मौर्य काल में यह मौर्य शासकों के अधीन था,
जो बाद में मालव गणराज्य में मिला दिया गया,
जिसका विवरण उनियारा ठिकाने के प्राचीन खण्डहरों से मिले सिक्कों ज्ञात होता है।
मध्यकाल में मुगल साम्राज्य के सम्राट अकबर के शासनकाल में जयपुर के राजा मानसिंह ने टारी और टोंकरा नामक जिलों को अपने अधिकार में लिया और टोंकरा के बारह गांव के भोला नामक ब्राह्मण को सन् 1643 में भूप के रूप में स्वीकार किया।
उसके बाद में बारह ग्राम समूहों को एक सूत्र में बांध कर उसका नामकरण ‘टोंक’ किया।
राजपूत शासनकाल में टोंक जिले का बड़ा भाग कई खण्डों में चावंडा, सोलंकी, कछवाह, सिसोदिया एवं चौहान आदि राजपूतों के अधीन रहा और कई स्थानों पर उनकी राजधानियां रही।
बाद में जयपुर, होल्कर और सिंधिया का इस क्षेत्र के बड़े भाग पर शासन रहा।
सन् 1806 में बनास नदी के उत्तरी भाग पर बलवन्त राव होल्कर से पिंडारियों के सरदार अमीर खां ने कब्जा कर लिया जिसे बाद में ब्रिटिश सैनिकों ने जीत लिया।
1817 की संधि के अनुसार यह क्षेत्र अमीर खां को लोटा दिया।
टोंक रियासत की स्थापना अमीर खाँ पिण्डारी ने 1817 ई. में की।