चुरू जिले के  दर्शनीय स्थल →Historical and scenic places of Churu district

चूरू का किला—

इस दुर्ग का निर्माण ठा. कुशालसिंह ने (संभवतया 1694 ई. में) करवाया था। 
अगस्त 1814 ईस्वी में बीकानेर ने चूरू पर चढाई कर दी। 
युद्ध का आगाज़ हो जाने पर चूरू के ठाकुर शिवजी सिंह ने दुश्मन से जमकर लौहा लिया लेकिन कुछ दिनों बाद इनके पास गोला और बारूद खत्म हो गए। 
आम लोगों द्वारा दी गई चांदी के गोले बनाकर, इस किले की आजादी की रक्षा के लिए यहाँ के शासक शिवसिंह ने दुश्मनों पर चाँदी के गोले दागे थे। 
चांदी के गोले दागने वाला किला, चुरु किला है।

सालासर बालाजी का मन्दिर—

आसोटा गाँव में हल चलाते वक्त एक किसान बाबा मोहनदास को दाढ़ी-मूंछ युक्त हनुमान जी की मूर्ति मिली, जिसने सुजानगढ़ तहसील के सालासर गाँव में इसका मंदिर बनवाया। 
यहाँ चैत्र पूर्णिमा को मेला लगता है। यह मंदिर संभवत: दाढ़ी – मूंछ युक्तु हनुमानजी का देश में पहला मन्दिर है।

वेंकटेश्वर/तिरुपति बालाजी का मन्दिर—

सुजानगढ़-चूरू। इसका निर्माण वेंकटेश्वर फाउण्डेशन ट्रस्ट के सोहनलाल जानोदिया द्वारा 1994 में डॉ. एम. नागराज एवं डॉ. वैकटाचार्य वास्तुविद् की देख-रेख में इटालियन मार्बल, ग्रेनाईट एवं मकराना मार्बल से दस हजार वर्ग फीट क्षेत्र में करवाया।
 इसका उद्घाटन-21 फरवरी, 1994—भैरों सिंह शेखावत।

ददरेवा— 

मुस्लिमों से युद्ध के दौरान गोगाजी का सिर ददरेवा (चूरू) में गिरा। 
ददरेवा में गोगाजी की शीर्ष मेड़ी/सिद्ध मेड़ी है।
 गोगाजी का जन्म स्थल भी ददरेवा ही है।

साहवा गुरुद्वारा का संबंध गुरुनानकदेव व गुरु गोविन्द सिंह जी से रहा है।
 कार्तिक मास की पूर्णिमा को यहां विशाल मेला लगता है।

द्रोणपुर— द्रोणाचार्य की आश्रम स्थली, गोपालपुर।


मंशा देवी— चूरू क्षेत्र की लोक देवी है।

उत्तराभिमुख सिंधी मंदिर— 

सुजानगढ़ में स्थित यह मन्दिर कांच की जड़ाई एवं स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। इस मन्दिर का पूरा नाम सागर सि‍न्धी मन्दिर है।

स्थानण—काली मां का मंन्दिर